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गोविंदा ने पहली बार सुनाया अपनी बीमारी का हिला देने वाला किस्सा, बोले, मेरे बचने की नहीं थी उम्मीद

कभी हीरो नंबर वन के नाम से मशहूर हुए अभिनेता गोविंदा अपनी लेट लतीफी के लिए बदनाम रहे हैं, लेकिन बुधवार को शायद वह पहली बार किसी कार्यक्रम न सिर्फ समय से पहुंचे बल्कि तय समय से 45 मिनट पहले पहुंच गए। किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि गोविंदा इतनी जल्दी पहुंच सकते हैं। इवेंट के आयोजकों को जैसे ही पता चला कि गोविंदा आ गए हैं, वे सब भी आनन फानन में मौके पर पहुंचे। तब तक गोविंदा अपनी गाड़ी में बैठकर समय काटते रहे हैं। खुशहाल मरीज तो खुशहाल डॉक्टर, नामक इस कार्यक्रम में गोविंदा की मौजूदगी थी जीवन की सबसे बड़ी जरूरत हंसी के लिए।

कार्यक्रम में गोविंदा ने लोगों को बताया कि खुश रहना ही आधे मर्ज को खत्म कर देता है। वह कहते हैं, ‘स्वस्थ रहने के लिए सबसे जरूरी है हंसना। मैं खूब हंसता हूं। इतना कि लोग मेरी हंसी देखकर कहते है कि कितना हंसता है। इंसान को जीवन में खूब हंसना चाहिए, खुशी में तो लोग हंसते ही हैं लेकिन दुखी होने पर और ज्यादा हंसना चाहिए। इससे दुख भाग जाता है। हम ईश्वर पर बहुत विश्वास करते है और दूसरे डॉक्टर पर इतना विश्वास करते हैं कि उनको अपना शरीर सौंप देते हैं। डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप इसलिए माना जाता है।’

बचपन में हुई अपनी एक गंभीर बीमारी के बारे में भी गोविंदा ने इस मौके पर खुलासा किया। वह कहते हैं, ‘जब मैं सात वर्ष का था तो बहुत बीमार रहता था, मेरे सारे दांत गिर गए थे। पूरे बाल झड़ गए। इलाज के दौरान शरीर का कोई ऐसा अंग नहीं बचा जहां इंजेक्शन न लगा हो। डॉक्टर सोच रहे थे कि अब किस जगह इंजेक्शन लगाऊं। उस समय मेरी तोतली आवाज निकल रही थी। 13 साल की उम्र तक ऐसे ही रहा। मैंने डॉक्टर से पूछा, डॉक्टर साहब क्या लगता है मैं जिन्दा तो रहूंगा ना? उन्होंने बोला, अरे गोविंदा, तू तो स्टार बनेगा, तुझे दुनिया देखेगी। शायद उस समय उनके जिह्वा पर सरस्वती बैठी थी।’

कार्यक्रम के दौरान गोविंदा तमाम ऐसे किस्से सुनाए जिनके बारे में उनके करीबियों को भी शायद अब तक पता नहीं था। एक ऐसा ही किस्सा उन्होंने एक अनजान फकीर का सुनाया। वह कहे हैं, ‘जब 13 वर्ष का हुआ तो एक फकीर आए और उन्होंने पानी पीने के लिए मांगा। उस समय रोजा का समय चल रहा था तो कोई उन्हें पानी नहीं दे रहा था। मैं उनके लिए पानी और खाना लेकर आया। उनकी आवाज मुझे बहुत सुरीली लगी। मुझे लगा जरूर इनको कोई इल्म है। उसके बाद 14 साल से लेकर 21 साल तक मुझे किसी न किसी रूप में वह मिलते रहे।’ गोविंदा का मानना है कि मां के आशीर्वाद और साधु महात्माओं की सेवा से ही उन्हें कामयाबी मिली।

चमत्कार को नमस्कार करने वाली दुनिया का असर गोविंद पर भी हुआ है। वह बताते हैं, ‘बचपन में पूजा पाठ में मेरा यकीन नहीं था। एक साधु महात्मा आए तो सुबह छह बजे से साढ़े ग्यारह बजे तक मैं उनके पांव दबाता रहा। उन्होंने मुझे रोका नहीं। मैं भी पांव दबाते दबाते थक गया था तो बचपन में कुछ समझ नहीं आया और मैंने वहीं पास रखी केतली उनके सिर पर मार दी। लेकिन, वह नाराज नहीं हुए। उल्टा मेरी मां से बोले, तुम्हारा बेटा किसी पर विश्वास नहीं करता। आज इसको ऐसी दवाई देंगे कि इसकी सारी तकलीफ दूर हो जाएगी।’ गोविंदा ने कार्यक्रम में देर तक अपने जीवन से जुड़ी बातें बताईं। लोगों से एक दूसरे पर भरोसा बनाए रखने की अपील की और सबसे ज्यादा जरूरी बात जो कही वह थी कि समय कैसा भी हो, चेहरे पर मुस्कान बनाए रखनी चाहिए।