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जीतन राम मांझी ने आरक्षण को बताया माथे का कलंक, कहा- कॉमन स्कूलिंग सिस्टम के बाद इसकी ज़रूरत नहीं

आरक्षण को लेकर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने एक बड़ी बात कही है. मांझी ने कहा कि आरक्षण दलितों के माथे पर एक कलंक जैसा चिपक गया है जो भीख में दी गई चीज़ लगने लगी है. मांझी ने कहा कि अगर देश में कॉमन स्कूलिंग सिस्टम लागू हो जाए तो दस साल बाद आरक्षण की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी. जीतन राम मांझी दिल्ली में अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाषण दे रहे थे. मांझी ने कहा कि आरक्षण के ज़रिए नौकरी पाए व्यक्ति को बार बार हीन भावना से देखा जाता है और उसकी काबिलियत पर सवाल उठाए जाते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि आरक्षण देकर एहसान किया गया हो. मांझी ने याद दिलाया था कि ख़ुद भीमराव अंबेडकर ने दस साल पर आरक्षण की व्यवस्था की समीक्षा की बात कही थी.

‘कॉमन स्कूलिंग सिस्टम लागू हो’

जीतन राम मांझी ने कहा कि दुनिया के कई अन्य देशों की तरह भारत में भी कॉमन स्कूलिंग सिस्टम लागू हो जाए तो आरक्षण की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी. मांझी के मुताबिक़ कॉमन स्कूलिंग व्यवस्था में राष्ट्रपति के बच्चे से लेकर दलित वर्ग का बच्चा एक ही विद्यालय में पढ़ेगा जिससे दोनों को समान अवसर मिल सकेगा. ऐसी व्यवस्था लागू होने के दस साल बाद फिर समीक्षा की जानी चाहिए कि आरक्षण की ज़रूरत है या नहीं. अपना उदाहरण देते हुए मांझी ने कहा कि शिक्षित होने के चलते ही वो जीवन में ऊंचा मुक़ाम हासिल कर पाए हैं.

‘दोहरी मतदाता व्यवस्था लागू हो’

दलितों के उत्थान के लिए मांझी ने अंबेडकर के दोहरे मतदाता व्यवस्था के सिद्धांत को लागू करने की मांग की. मांझी के मुताबिक़ इस व्यवस्था के तहत दलितों को दोहरे मतदान का अधिकार मिलेगा. पहला , ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों का चयन किया जाए जो दलितों के लिए आरक्षित हों और उनमें केवल दलित ही मतदान करें. दूसरा , दलित अपने अपने क्षेत्रों में आम मतदान में भी भाग ले सकेगा. मांझी ने दावा किया कि इस व्यवस्था से दलितों के नेता दलितों के वोट से ही चुने जाएंगे जिससे उनकी प्राथमिकता केवल दलितों का विकास और उत्थान ही रहेगा.

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