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जिस घुरघुरी में मां सीता ने धोये थे पैर, स्वाती सिंह अब करेंगी कायाकल्प

कई दशकों से उपेक्षित मोहान रोड स्थित ऐतिहासिक घुरघुरी तालाब का अब सुंदरीकरण होगा। इसके लिए सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र की विधायक व प्रदेश सरकार की राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) स्वाती सिंह बहुत दिनों से कोशिश में थीं। इस ऐतिहासिक तालाब के लिए 157.70 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति मिल चुकी है। इसमें से प्रथम 40 लाख रुपये की पहली किश्त जारी भी कर दिया गया है। इस तालाब का अस्तित्व भगवान श्रीराम के समय का माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि बिठूर जाते समय सीता ने इसमें पैर धोए थे। इसके बाद यहां का जल अमृत बन गया था। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा जारी किये गये बजट के साथ ही उच्च गुणवत्ता पूर्ण कार्य करने की बात कही गयी है। 19वीं सदी में एक हिंदू राजा गुरुदयाल द्वारा बनवाये गये इस तालाब के प्रति उधर के लोगों में काफी आस्था है। दूर-दूर से लोग आकर इस तालाब में पूजा-पाठ करते हैं।

 

इस तालाब के किनारे दुर्गा व हनुमान जी का मंदिर भी है। कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले मेले में काफी दूर-दूर से लोग यहां आते हैं। राज्यमंत्री स्वाती सिंह ने कहा कि सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र हमारा परिवार है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने हर आस्था के केन्द्र को सुंदर व आकर्षक बनाने के लिए हर तरह से प्रयास किये हैं। इसी कड़ी में हमने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपने विधानसभा क्षेत्र के इस ऐतिहासिक तालाब के सुंदरीकरण के लिए अनुरोध किया था। इसके लिए उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने बजट को स्वीकृति देते हुए प्रथम किश्त भी जारी कर दी। काकोरी कस्बे में घुरघुरी तालाब के बारे में मान्यता है यह भगवान राम के समय से इसका अस्तित्व है।

कहा जाता है कि बिठूर जाते समय सीता ने इसमें पैर धोए थे। इसके बाद यहां का जल अमृत बन गया था। लोग कहते हैं कि कभी इस तालाब का जल लगाने से घाव ठीक हो जाते थे। यहां का पानी पीने से बीमार लोग ठीक हो जाते थे। देख-रेख के अभाव में तालाब का पानी प्रदूषित होता चला गया। आसपास के गांवों के लोग यहां कागज में अपनी अर्जी लिखकर यहां एक दीवार में लगा जाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से उनकी मुरादें पूरी हो जाती हैं। यह तालाब करीब साढ़े चार बीघे के खुले परिसर में बना हुआ है। स्थानीय निवासी महादेव प्रसाद अवस्थी ने बताया कि तालाब को गोड़ धुली नाम से भी जाना जाता है। कालांतर में इसे दस्तावेजों में गुरघुरी के नाम से दर्ज कर दिया गया। यह गुरुदयाल लाला के नाम पर दर्ज है जिनके बारे में लोगों को कुछ नहीं मालूम है।

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