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गुजर गया उमा भारती का युग… अपने ही चुनावी क्षेत्र में उपेक्षा से उपजे सवाल

बुंदेलखंड में जन्मी भाजपा की फायर ब्रांड नेता उमाभारती की 2022 में उत्तर प्रदेश सहित 5 राज्यों में होने वाले चुनावों में पार्टी आलाकमान को कोई जरूरत नहीं लग रही है। ऐसा इसलिए समझा जा रहा है क्योंकि उमा भारती के जन्मस्थान बुंदेलखंड की तो क्या कहें, उत्तर प्रदेश में उनकी कोई पूछ-परख नहीं हो रही है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के झांसी, महोबा दौरों से लेकर हाल ही जन विश्वास यात्रा को हरी झंडी दिखाने झांसी आए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तक के मंचों पर उमा भारती दिखाई नहीं दीं। ज्ञात हो कि उमा भारती 2014 के लोकसभा चुनाव में बुंदेलखंड की झांसी-ललितपुर संसदीय सीट से पार्टी की सांसद रह चुकीं हैं और केंद्र में मानव संसाधन मंत्रालय भी संभाल चुकीं हैं। उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रह चुकीं हैं और पार्टी से हुए मतभेदों के चलते उन्होंने अपने पसंदीदा बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बिठाया था।

गर्म स्वभाव की उमा का विवादों से गहरा नाता रहा है। इस चक्कर में एक बार वे पार्टी से बाहर भी हो चुकीं हैं और अपनी अलग पार्टी भी बना चुकीं हैं। बुंदेलखंड में लोधी वोटों और एक समय देश में पिछड़ों की निर्विवाद नेता उमा भारती को प्रसिद्धि तब अधिक मिली जब संघ-भाजपा के राम मंदिर निर्माण आंदोलन चरम पर था। पार्टी ने उनके उग्र हिंदुत्ववादी चेहरे और आक्रामक तेवरों को खूब बनाया। साध्वी वसुंधरा के साथ उनकी जोड़ी ने राम मंदिर आंदोलनकारियों में खूब प्रसिद्धि पाई।

दुर्भाग्य इन्हीं तेवरों के चलते उनकी पार्टी के अंदर भी किसी न किसी से अनबन रही। यहां तक कि पार्टी के सबसे बड़े चेहरे राजनीति में शालीनता की प्रतिमूर्ति अटल बिहारी वाजपेई तक से उनका विवाद हुआ और उमा को पार्टी छोड़नी पड़ी। उमा भारती ने पार्टी को तेवर दिए लेकिन पार्टी ने भी उनको बहुत कुछ दिया। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री और संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के स्तर तक उमा पहुंची। एक समय तो उनके पार्टी की कमान संभालने तक बात पहुंच गयी। उमा भारती का उस समय पार्टी के एक और बड़े नेता और चिंतक गोविंदाचार्य के साथ निजी प्रसंगों ने बड़ा नुकसान किया। कहा जाता है कि दोनों के बीच का मामला शादी तक पहुंचने वाला था। कुछ मौकों पर उमाभारती ने यह स्वीकार भी किया।

बहरहाल आज आलम यह है कि उमा पार्टी में टोटल हाशिए पर हैं। केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति तक ने जब झांसी में राजनाथ सिंह के साथ मंच शेयर किया तो लोगों को शिद्दत से उमाभारती की याद आई। इलाके में ठोस पहचान रखने वाली इस नेता का अपने ही क्षेत्र में पार्टी कार्यक्रमों से यूं नदारद रहना हैरानी भरा लगा। यूपी में बीजेपी के शुरुआती चुनावी अभियान की बड़ी सभा में उमा भारती का न होना चर्चा का विषय बना और इसको लेकर कई सियासी मायने भी निकाले जा रहे हैं।

उमा भारती 2014 के लोकसभा चुनाव में झांसी से चुनाव लड़ी थीं और उन्होंने यहां लगातार हार रही बीजेपी को बड़ी जीत दिलाई थी। वह केंद्र की मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री रही हैं। 2019 में उमा भारती ने तीन साल तक चुनाव न लड़ने का संकल्प लिया तो उनकी जगह यहां बीजेपी ने अनुराग शर्मा को लोकसभा के मैदान में उतारा और वह जीत भी गए। उमा पार्टी की वह नेता हैं जिनका उप्र के लोधी समाज की कई सीटों पर निर्णायक असर तो है ही, उनका निजी आभामंडल भी पार्टी को लोधियों से इतर हिंदुत्ववादी वोट दिलाने की गारंटी है, इसके बावजूद उमा बीजेपी की चुनावी सभाओं से गायब हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि पार्टी ने उमाभारती को चुका हुआ मान उनके ही घर तक में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है या किसी खास मिशन या मौके पर उमा भारती को पार्टी याद करेगी।

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