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कुंभ मेला क्यों लगता है, गंगा स्नान करने से क्या होता है – पढ़िए लॉजिक और मान्यताएं

भारतवर्ष में दिनांक 11 मार्च 2021, हिंदू धर्म के पंचांग के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी (02:40 PM तक उपरांत चतुर्दशी), प्रमादि संवत्सर विक्रम संवत 2077, बृहस्पतिवार महाशिवरात्रि के अवसर पर कुंभ मेले का आयोजन किया जा रहा है। पहला शाही स्नान हरिद्वार में होगा। शास्त्रों के अनुसार कुंभ मेला स्नान का पर्व है। इस अवसर पर, देश विदेश के करोड़ों लोग गंगा स्नान के लिए आते हैं। निश्चित रूप से प्रश्न उपस्थित होता है कि कुंभ मेले के आयोजन का औचित्य क्या है और इस अवसर पर गंगा स्नान करने से क्या लाभ होता है। आइए अध्ययन करते हैं:-


कुंभ मेले के आयोजन की धार्मिक कथा

भारतवर्ष में प्रचलित हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण इंद्र देव की शक्तियां खत्म हो गई थी। हर जगह राक्षसों का वर्चस्व बढ़ गया और स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया। फिर परेशान इंद्र देव ब्रह्मा के पास मदद मांगने पहुंचे। तब ब्रह्म देव ने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेज दिया तब उन्होंने समुद्र मंथन का सुझाव दिया। फिर देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ। जिसमें कई रत्नों के साथ अमृत कलश भी निकला।

कुंभ मेले का आयोजन 12 वर्ष में एक बार क्यों होता है

हर कोई अमृत को पीकर अमर होने चाहता था। इसके लिए देवताओं और राक्षसों में युद्ध हुआ। यह युद्ध 12 दिनों तक चला जिसे पृथ्वी पर 12 वर्ष की मान्यता दी गई है। यही कारण है कि एक स्थान पर कुंभ मेले का आयोजन 12 वर्ष में एक बार होता है।

कुंभ मेला सिर्फ प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में ही क्यों लगता है

इसी युद्ध के दौरान अमृत कलश की कुछ बूंदे प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन की पवित्र नदियों में गिर गई। ऐसे में अमृत प्रभाव और पुण्य प्राप्ति हेतु चारों स्थानों पर हर 12 साल में एक बार कुंभ मेला लगता है। इस स्थानों पर हर तीन वर्ष के अंतरात पर एक बार कुंभ मेला लगता है।

कुंभ मेला के अवसर पर गंगा नदी स्नान से क्या होता है

हिंदू धर्म में नदियों में स्नान करने के लिए कुछ मुहूर्त और पर्व निर्धारित किए गए हैं। कुंभ मेला के अवसर पर गंगा नदी स्नान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके पीछे सिंपल लॉजिक यह है कि ऐसे लोग जो नदियों से दूर रहते हैं, विशेष अवसर पर नदियों के सानिध्य में आए और इसी बहाने नदी का सोशल ऑडिट भी हो जाए। नदियों का ज्यादातर हिस्सा जंगलों में होता है। सदियों पहले दानव और वर्तमान में माफिया नदियों की धारा मोड़ देते हैं। इसलिए प्रमुख नदियों का सोशल ऑडिट जरूरी है।

गंगा नदी ना केवल 40% भारत में रहने वाले नागरिकों के जीवन के लिए अनिवार्य है बल्कि दुनिया भर की तमाम नदियों में गंगा एकमात्र चमत्कारी नदी है। इसके जल में कभी कीड़े नहीं पड़ते। गंगाजल में भरपूर मात्रा में मिनरल्स होते हैं। यही कारण है कि गंगाजल को अमृत के समान माना गया है। कम से कम 3 साल में एक बार प्रत्येक नागरिक को गंगा नदी में स्नान करना चाहिए। यह उसके स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम है। क्योंकि भारत की जलवायु ऐसी है कि यहां के नागरिक अनुशासित नहीं बल्कि लापरवाह होते हैं इसलिए मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, पूर्णिया, अमावस्या और महाशिवरात्रि के अवसर पर गंगा स्नान को महत्वपूर्ण बताया गया है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गंगा स्नान से लाभ

श्रद्धा पूर्वक गंगा नदी के किनारे पूजा करने एवं स्नान करने से श्रद्धालु को सम्मान और यश की प्राप्ति होती है। इसीलिए कहा जाता है कि उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त होता है।

मांगलिक दोष वाले व्यक्ति यदि वर्ष में एक बार पर्व के अवसर पर निर्धारित मुहूर्त में गंगा स्नान करते हैं तो उनकी कुंडली में मांगलिक दोष का प्रभाव शून्य हो जाता है। विवाह में बाधा नहीं आती। दांपत्य जीवन सुख पूर्वक बताएं।

कुछ ज्योतिष विशेषज्ञों का दावा है कि गंगा स्नान करने से सभी ग्रहों का प्रभाव मंद पड़ जाता है। साढ़ेसाती शनि, राहु अथवा मंगल की महादशा, कालसर्प दोष, पित्र दोष इत्यादि वाले जातकों को प्रतिवर्ष गंगा नदी में स्नान करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर पाते हैं तो पर्व के अवसर पर शुभ मुहूर्त में उनके निकट स्थित पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए।

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