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उत्तर प्रदेश 2022 की ऐसी होगी सियासी जंग, योगी के सामने अखिलेश होंगे विपक्ष का चेहरा !

लेखक :- सुरेंद्र सिंघल,राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार. 
आगामी वर्ष 2022 के माह फरवरी-मार्च में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव होंगे। चुनावी जंग कैसी होगी इसे लेकर राजनैतिक विश्लेषण हो रहे हैं। पिछले तीन चुनावों 2007, 2012 और 2017 में कोई भी विश्लेषक चुनाव परिणामों का सही अंदाजा नहीं लगा पाया था। उत्तर प्रदेश बड़ा प्रांत है और वहां की जातीय समीकरण बहुत जटिल है। 2022 के होने वाले चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी जिम्मेदारी महसूस करते हुए दो दिन पहले अपने चुनाव क्षेत्र काशी से भाजपा के चुनाव अभियान का डंका बजा दिया है।
उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा का नेतृत्व प्रखर हिंदुत्ववादी नेता योगी आदित्यनाथ करेंगे। जिनके पक्ष में कई बातें बहुत ही मजबूत हैं। 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने जिस सोच और रणनीति के तहत गोरखपुर के अपने पार्टी सांसद महाराज योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश सरकार की बागडोर सौंपी थी। उस पर योगी खरे उतरे है। इसलिए भाजपा के रणनीतिकारों ने उन पर भरोसा कायम रखा। उनकी अगुवाई में ही चुनाव संघर्ष में जाने का निर्णय राजनैतिक नजरिए से ठीक है। इसमें कोई जोखिम दिखाई नहीं देता है। भाजपा को 15 सालों के अंतराल के बाद 2017 में अभूतपूर्व सफलता मिली थी। उसे करीब 40 फीसद मत मिले थे और 312 सीटों का शानदार बहुमत प्राप्त हुआ था। अभी चुनाव आठ माह दूर है।
उत्तर प्रदेश में 2017 से पहले जो स्थितियां थीं। उनमें योगी सरकार अनुकूल बदलाव करने में सफल रही है। तब अपराध और अपराधियों का हर तरफ बोलबाला था। बिजली आपूर्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार की स्थिति सोचनीय थी। नियुक्तियों और तबादलों में यादव जाति का वर्चस्व दिखता था। जिलों में स्थानीय मुस्लिमो का दबदबा बना हुआ था। जिससे दूसरा तबका भयभीत रहता था। उससे छुटकारा पाने को लोग बैचेन थे। इसी के चलते भाजपा को 2017 के चुनावों में ऐतिहासिक सफलता मिली। प्रमुख खबर एजेंसी पीटीआई के संवाददाता रहे डा. अशोक कुमार राघव कहते है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिंदुत्व के एजेंडे को मजबूती से लागू किया। जातियों में बंटा प्रदेश उस तनावीय स्थिति से बाहर निकला। जातियों में परस्पर समन्वय और सद्भाव बढ़ा। इस कारण भाजपा के सामने सत्ता विरोधी रूझान का संकट नहीं है। विपक्ष भाजपा और सरकार का कारगर तरीके से सामना नहीं कर पा रहा है।
लोकतांत्रिक संस्थाएं और प्रदेश की जनता अच्छे और सुदृढ़ विपक्ष की कामना करती है। लेकिन उसकी कसौटी पर सपा, बसपा और कांग्रेस खरे नहीं उतर पा रहे हैं। अभी जो स्थिति उत्तर प्रदेश में उभर कर सामने आ रही है। उसमें समाजवादी पार्टी और उसे नेता अखिलेश यादव का चेहरा सामने है। अखिलेश यादव 2012 से 2017 तक पूर्ण बहुमत की सरकार चला चुके हैं। लेकिन वह किसी भी मोर्चे पर सफल नहीं हो पाए और उसका खामियाजा उन्हें 2017 में भुगतना पड़ा। उस चुनाव में अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के चेहरे को साथ रखकर चुनाव लड़ा था। दोनों की ही दुर्गति हुई थी। उत्तर प्रदेश की जनता को दो युवाओं का चेहरा नहीं भाया था।
2019 का लोकसभा चुनाव अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को पीछे करके मायावती के साथ मिलकर लड़ा था। उनकी पत्नी डिंपल ने मायावती के चरण स्पर्श कर आर्शीवाद लिया था लेकिन सपा की लोकसभा सीटें पांच की पांच ही रहीं। इस बार अखिलेश यादव अपने खुद के चेहरे के साथ चुनावी जंग का हिस्सा बने हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वह राष्ट्रीय लोकदल को बड़ी भूमिका में रखेंगे। प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह के पौत्र जयंत चौधरी युवा और शिक्षित हैं लेकिन उनका राजनैतिक प्रभाव ना तो अपने बाबा जैसा है और ना ही अपने पिता हाल ही में दिवंगत हुए चौधरी अजित सिंह जैसा है। भाजपा से नाराज जाट बिरादरी जयंत चौधरी के साथ जा रही है। सपा के कारण मुस्लिम भी रालोद के साथ रहेगा इसमें कोई शक शुबाह नहीं है। पश्चिम में भाजपा के रणनीतिकारों ने किसानों की प्रमुख जाट बिरादरी को समुचित भागीदारी और सम्मान दिया है।
हाल ही में संपन्न जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनावों में भाजपा नेतृत्व ने सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, गौतमबुद्ध नगर और बुलंदशहर इन छह जिलों में जाट बिरादरी के जिला पंचायत अध्यक्ष चुनवाएं हैं। भाजपा के पश्चिम और बृज क्षेत्र के संगठन महामंत्री इसी जाट बिरादरी के करमवीर सिंह मुख्य रणनीतिकार हैं। पश्चिमी क्षेत्र भाजपा के अध्यक्ष मोहित बेनीवाल भी जाट बिरादरी से ही हैं। बागपत के सांसद डा. सत्यपाल सिंह तोमर, मुजफ्फरनगर से केंद्र में राज्यमंत्री डा. संजीव बालियान जाट हैं। मुरादाबाद क्षेत्र के चौधरी भूपेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में जाट बिरादरी का प्रतिनिधित्व करते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट पट्टी में भाजपा में जाटों का वर्चस्व रालोद से कहीं ज्यादा है। इसलिए भाजपा के सामने किसान आंदोलन से उपजी नाराजगी और जाटों की रालोद में वापसी से कोई बहुत बड़ा नुकसान भाजपा को नहीं होने वाला है।उत्तर प्रदेश में इस बार का मुकाबला भाजपा और सपा के बीच सीधा होने वाला है।
जिसका लाभ सपा को मिल सकता है। कांग्रेस का कमजोर होना और किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा ना होना कांग्रेस को शून्य की ओर ले जाएगा। बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती अपनी पार्टी की दुर्गति करने के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने अपने अहंकार को तुष्ट करने के लिए अपनी पार्टी के अनेक जातीय क्षत्रपों को एक-एक करके बाहर का रास्ता दिखा दिया है। सैकड़ों जातीय और उनके नेताओं को जोड़कर और मेहनत करके कांशीराम ने जिस बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश की एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया था। उसे मायावती मटियामेट कर चुकी है। बहुजन समाज पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवार ही सपा भाजपा की लड़ाई को त्रिकोणीय संघर्ष में बदल पाएंगे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा की कोर बिरादरी चमार और जाटव का बड़ा तबका भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर की ओर आकर्षित है। उसकी आजाद समाज पार्टी ने पंचायत चुनावों में बसपा के वोट बैंक में जबरदस्त सेंधमारी करके अपने बढते प्रभाव का प्रदर्शन किया था। जाहिर है जो मायावती 2007 में अपने बूते बसपा को पूर्ण बहुमत से सत्ता में ले आई थी।
आज वह कहीं भी ताकतवर भाजपा को चुनौती देने लायक हालत में नहीं बची है। पूरे उत्तर प्रदेश में भाजपा से अखिलेश यादव लड़ते दिखेंगे। अखिलेश यादव के साथ यादव और मुस्लिमों के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों का समर्थन भी है। लेकिन भाजपा ने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे करके और योगी आदित्यनाथ के रूप में जो सफल नेतृत्व प्रदेश को दिया है उससे जातीय विरोधाभास खत्म हो गया है। अन्य पिछड़ी जातियां कुर्मी, लोध, गुर्जर, जाट, सैनी, कश्यप भाजपा के पक्ष में लामबंद हैं। उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने जिनसे अभी योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को प्रबल चुनौती मिली थी और जिसका हल भाजपा आलाकमान फिलहाल कर चुकी है, ने पूरे उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों को एकसूत्र में बांधा हुआ है। केशव प्रसाद मौर्य की लोकप्रियता सैनी और कश्यप बिरादरी में बढ़ी है। उन्होंने भाजपा में अपने इन लोगों को मजबूती, ताकत और सम्मान दिलाया है।
उत्तर प्रदेश की सवर्ण जातियां बनिया, राजपूत और ब्राह्मण योगी के नेतृत्व को पसंद भी करते हैं और उनसे संतुष्ट भी हैं। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह मजबूत कुर्मी बिरादरी का प्रतिनिधित्व करते हैं और व्यक्तिगत रूप से भी वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अनन्य प्रशंसक हैं। भाजपा ने हाल ही में बनिया बिरादरी के सिरमौर पीयूष गोयल को राज्यसभा में पार्टी का नेता बनाया है। उसका भी उत्तर प्रदेश की मजबूत व्यापारी वैश्य बिरादरी में अच्छा संदेश गया है। यह बिरादरी इस पार्टी को अपनी पार्टी मानती है और पहली बार उसके दो बड़े नेता अमित शाह और पीयूष गोयल इस पार्टी पर शीर्ष पर बिराजमान हैं। उत्तर प्रदेश में पुलिस प्रमुख का पद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुकुल गोयल को सौंपा है। जो कम से कम तीन-साढ़े तीन साल तक इस पद पर बने रह सकते हैं। उत्तर प्रदेश के संगठन महामंत्री सुनील बंसल को लेकर भी प्रदेश की बनिया बिरादरी अपने हितों को लेकर सुरक्षित महसूस करती है। ऐसे में भाजपा उत्तर प्रदेश में अजय दिखती है। उसका मुकाबला उससे बेहतर दल ही कर सकता है। जिसकी उपस्थिति उत्तर प्रदेश में नहीं है।
योगी उत्तर प्रदेश में भाजपा का चुनावी चेहरा होंगे और उनके साथ चुनाव अभियान में स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह शामिल रहेंगे। उत्तर प्रदेश जो पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान परस्त दहशतगर्दों की गतिविधियों के रूप में देश को अंदरूनी चुनौती देने की ओर बढ़ता दिख रहा था उस पर योगी जी ने निर्ममता से प्रहार किया। साढे चार सालो में इस प्रदेश में दंगे-फसाद भी नहीं हुए जिससे पूरी जनता को राहत मिली। उद्योग-धंधों को पनपने में अनुकूल माहौल मिला। काशी में प्रधानमंत्री ने जिस मुक्तकंठ से योगी जी की प्रशंसा की है और उसी क्रम में रविवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रसाद नड्डा ने दोहराया है उससे प्रदेश में भाजपा का मनोबल सातवें आसमान पर है। विपक्ष में धुरंधर नेताओं का अभाव है और भाजपा से मुकाबला करने वाली समाजवादी पार्टी उतनी तैयार नहीं दिखती है जो वह भाजपा को सत्ताच्युत कर सके। अभी चुनाव में सात-आठ माह का लंबा समय है।
भाजपा और उसकी सरकार को लेकर सत्ता विरोधी (एंटी इन कम्बेन्सी) रूझान नहीं है लेकिन भाजपा विधायकों को लेकर उनके क्षेत्रों में जबरदस्त नाराजगी दिख रही है। अभी तक मिली जानकारी के अनुसार कम से कम भाजपा के सौ विधायक ऐसे हैं जिन्हें यदि नहीं बदला गया तो वे चुनाव हार सकते हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने सांसदों की टिकट नहीं काटने का खामियाजा हार के रूप में भुगत चुकी है। सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा में हार का कारण अपने उम्मीदवारों को ना बदला जाना माना जा रहा है। पश्चिम क्षेत्र के हर जिले में यदि भाजपा नेतृत्व नए उम्मीदवार उतारता है तो उसको शत प्रतिशत जीत मिल सकती हैं। देखना होगा भाजपा यह निर्णय ले पाती है या नहीं।
नोट – यह लेखक का अपना निजी विचार है, इससे दैनिक संवाद मीडिया का कोई सरोकार नहीं है। 

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