जब अमेठी में चुनावी मैदान में आमने-सामने था गांधी परिवार

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी  लोकसभा चुनाव के लिए आज नामांकन भरने जा रहे हैं। इस दौरान वह एक रोड शो भी करेंगे। उनकी बहन प्रियंका गांधी  भी साथ मौजूद होंगी। अमेठी कांग्रेस का गढ़ है और पार्टी को हमेशा लोगों का प्यार मिलता रहा है। पर, इस सीट पर एक बार ऐसा भी हुआ था जब गांधी परिवार खुद आमने-सामने था। जी हां, 1984 के लोकसभा चुनाव में गांधी परिवार के आमने-सामने होने से सियासी लड़ाई यहां काफी दिलचस्प हो गई थी।

यूं तो अमेठी की सियासी लड़ाई हमेशा से ही दिलचस्प रही है। 1984 लोकसभा चुनाव में लोग तब हैरान रह गए, जब गांधी परिवार आपस में ही लड़ गया। यह मुकाबला राजीव गांधी और संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी के बीच था। अमेठी से मेनका के पति संजय गांधी सांसद हुआ करते थे और उन्होंने काफी काम भी किया था इसलिए मेनका को उम्मीद थी कि अमेठी की जनता उन्हें ही चुनेगी।

चुनाव चाहे लोकसभा के हों या राज्यसभा या विधानसभा के, किसी त्योहार से कम नहीं होते। हर बार ऐसी यादें भी रह जाती हैं जो चुनावी इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो जाती हैं। आगे तस्वीरों में देखें, ऐसे ही कुछ ऐतिहासिक पल…

1989 की चुनावी तस्वीर को देखते तीन दोस्त। 1984 में भारी जीत के बाद 1989 में कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी थी। उस वक्त भारतीय जनता पार्टी ने लंबी छलांग मारते हुए 2 सीटों से बढ़कर 85 सीटें अपने नाम की थीं। कांग्रेस उन चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर जरूर उभरी थी लेकिन जनता दल ने बीजेपी और लेफ्ट के साथ मिलकर वीपी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई थी।

आज हम नतीजे घर से लेकर बाजारों तक में लगीं बड़ी-बड़ी स्क्रीन्स पर देखते हैं। तस्वीर में देखिए, नई दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया ऑफिस के पास स्कोरबोर्ड पर डिस्प्ले किए गए 1980 लोकसभा चुनाव के नतीजे।

इलाहाबाद में प्रचार करते अमिताभ बच्चन। 1984 लोकसभा चुनाव में अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद से चुनाव लड़ा था, उन्होंने एचएन बहुगुणा को हराया था। अमिताभ इस सीट से 1,87,795 मतों से जीते थे हालांकि तीन साल बाद उन्होंने राजनीति छोड़ने का ऐलान कर सांसद पद से इस्तीफा दे दिया था। 1984 के चुनावों में बांद्रा के पाली हिल में एक पोलिंग बूथ पर अपनी बारी का इंतजार करते ऐक्टर ऋषि कपूर।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार मुंबई में परेल स्थित राष्ट्रीय मिल मजदूर संघ के दफ्तर का 4 नवंबर 1989 को नारियल फोड़कर बॉम्बे की 6 सीटों पर लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के प्रचार अभियान की शुरुआत करते हुए। उनके साथ प्रत्याशी (बाएं से दाएं) डीटी रुपवते, शरद दिघे, मुरली देवड़ा, सुनील दत्त और उद्योग मंत्री रामराव अदिक।

1991 में राजीव गांधी बॉम्बे में एक रैली को संबोधित करते हुए। इससे पहले के लोकसभा चुनाव सिर्फ 16 महीने पहले ही हुए थे। 1991 के चुनावों में किसी पार्टी को बहुमत में नहीं मिला था और कांग्रेस ने अल्पमत की सरकार बनाई थी। इसी दौरान 20 मई को चुनाव के पहले चरण के मतदान के एक दिन बाद ही 21 मई को प्रचार करते हुए तमिलनाडु में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी।

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बासु के साथ। उस वक्त ममता केंद्रीय युवा, खेल और बाल कल्याण मंत्री थीं। यह मुलाकात कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग में हुई थी। बासु ने 23 साल तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का पद संभाला और सबसे लंबे वक्त तक सीएम रहने वाले देश के मुख्यमंत्रियों में से एक रहे। उस वक्त इन दोनों को शायद ही इस बात का अंदाजा होगा कि इस मुलाकात के 20 साल बाद ममता बनर्जी खुद उस पद पर काबिज होंगी। इस बीच ममता ने कांग्रेस से निकलकर अपनी खुद की पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बनाई।

14 मार्च 2000 को कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा के लिए मुंबई विधानसभा में नामांकन भरते लेजंडरी ऐक्टर दिलीप कुमार। उनके साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख। दिलीप कुमार 2000 से 2006 तक राज्यसभा सांसद रहे।

उधर, इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद चुनाव हो रहे थे और प्रधानमंत्री बन चुके राजीव गांधी मैदान में थे। 1977 में हुए चुनाव में संजय गांधी हार गए थे, लेकिन 1980 में उन्होंने जोरदार वापसी की। 1980 में विमान हादसे में उनकी मौत के बाद उपचुनाव हुआ। उम्मीद की जा रही थी कि मेनका राजनीति में उतरेंगी और पति की सीट से चुनाव लड़ेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

तब इंदिरा गांधी पीएम थीं और राजीव गांधी राजनीति में आ चुके थे। इंदिरा ने मेनका की जगह राजीव गांधी को उपचुनाव में अमेठी से टिकट दे दिया। राजीव को हराने के लिए विपक्ष ने शरद यादव को उतारा, लेकिन राजीव चुनाव जीत गए। इस बीच मेनका और इंदिरा के संबंध बेहद खराब हो गए और मेनका अलग रहने लगीं।

उन्होंने संजय गांधी के पुराने दोस्तों के सहयोग से ‘संजय विचार मंच’ पार्टी बनाई। इस बीच 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। तब मेनका ने तय किया कि वह राजीव गांधी (तब प्रधानमंत्री) के खिलाफ मैदान में उतरेंगी। मेनका की सभाओं में भारी भीड़ उमड़ती थी, लेकिन ये भीड़ वोट में नहीं तब्दील हो पाई। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर में अमेठी की जनता ने मेनका को नहीं बल्कि राजीव गांधी को चुना, वह भी तीन लाख से भी अधिक मतों से।

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