जब 3 सीटों से चुनाव लड़ें वाजपेयी और एक सीट पर हो गई जमानत जब्त

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को राजनीति में शिखर पुरुष का दर्जा मिला था। जनता उनके भाषण कला की दीवानी थी, लोग उन्हें सुनने के लिए दूर दूर से आते और घंटों खड़े रहते। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब वाजपेयी को अपनी जीत सुनिश्चित करने  के लिए तीन तीन सीटों से मैदान में उतरना पड़ा था और उन तीन सीटों में से एक सीट पर जमानत जब्त हो गई।

1951 में जनसंघ की स्थापना हुई। 1952 के पहले आम चुनाव में जनसंघ को 3 सीटें मिली लेकिन वाजपेयी अपनी सीट नहीं बचा सके और चुनाव हार गए। 1957 के चुनाव में उन्हें फिर उम्मीदवार बनाया गया लेकिन इस बार पार्टी ने कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए इस बार वाजपेयी को 3 सीटों से उतारने का फैसला लिया गया। ये सीटें थीं मथुरा, लखनऊ और बलरामपुर। लखनऊ में वाजपेयी के सामने कांग्रेस के उम्मीदवार थे पुलिन बिहारी बनर्जी, मथुरा में उनके सामने थे और बलरामपुर में कांग्रेस के उम्मीदवार थे हैदर हुसैन। लखनऊ में  वाजपेयी को 57034 वोट मिले और वो दूसरे नंबर पर रहे। मथुरा की स्थिति सबसे ख़राब थी।  वहां वाजपेयी निर्दलीय उम्मीदवार राजा महेंद्र प्रताप  भी पीछे रहे और उनकी जमानत जब्त हो गई। मथुरा में वाजपेयी को मात्र 23620  वोट मिले।

करपात्री महाराज (दाहिने )

लेकिन तीसरी सीट बलरामपुर ने उन्हें लोकसभा पहुंचा दिया। हालाँकि जीत का अंतर बेहद कम था। बलरामपुर में वाजपेयी ने 1,18,380 वोट हासिल किये जबकि कांग्रेसी उम्मीदवार हैदर हुसैन को 1,08,568 वोट मिले थे। वाजपेयी 9812 वोटों से जीते। बलरामपुर में हिन्दुओं की अच्छी आबादी थी। 1952 के चुनाव में अखिल भारतीय राम राज्य परिषद् ने इस सीट को जीता था लेकिन 1957 में   वाजपेयी का समर्थन किया। हिन्दुओं पर करपात्री महाराज का अच्चा ख़ासा प्रभाव था।  करपात्री महाराज   ने ही बलरामपुर के राजा के साथ मिलकर अखिल भारतीय राम राज्य पार्टी की स्थापना की थी। करपात्री महाराज और जनसंघ ने वाजपेयी के  व्यापक अभियान चलाया जिस कारण वाजपेयी पहली बार लोकसभा पहुँचने में सफल रहे।

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