कमल का कमलासन ! नाथ का गया सिंहासन

मध्यप्रदेश में कांग्रेस को 15 महीनों में ही ले डूबी आपसी कलह

उपेक्षा, विश्वासघात, राजनीतिक महत्वाकांक्षा की कोख से मध्य प्रदेश में फिर पैदा हुई भाजपा सरकार?

कृष्ण कुमार द्विवेदी( राजू भैया)

भाजपा के कूटनीतिक कमलासन ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को इस्तीफे तक पहुंचा दिया! यहां कांग्रेस आपसी कलह के चलते मात्र 15 महीनों में ही सत्ता से दूर हो गई। जबकि राजनीतिक महत्वाकांक्षा एवं विश्वासघात तथा उपेक्षा की कोख से मध्यप्रदेश में एक बार फिर भाजपा की सरकार काबिज होने को तैयार है । भाजपा यहाँ सत्ता के कमलासन पर है तो कमलनाथ का सिंहासन उनसे छिटक चुका है।वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के राजनैतिक कैरियर पर भी प्रश्नचिन्ह लगता नजर आ रहा है?

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मध्यप्रदेश में बीते कई दिनों से चल रहे राजनीतिक नाटक का पटाक्षेप आज मुख्यमंत्री कमलनाथ के इस्तीफे के साथ ही हो गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद कमलनाथ ने फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफे की रणनीति को अपनाया है। इस दौरान कमलनाथ ने साफ कहा कि मेरे 22 विधायकों को महाराज एवं भाजपा ने करोड़ों अरबों खर्चा करके बंधक बनाया। लेकिन मैंने हमेशा सिद्धांतों की राजनीति की है। विकास पर फोकस किया है। मैं खरीद-फरोख्त की राजनीति में विश्वास नहीं रखता इसलिए मैं इस्तीफा देता हूं। एमपी के मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा को 15 साल मिले और मुझे मात्र 15 महीने जबकि इसी में ढाई महीने चुनाव के चलते भी मेरे काम की गति पर प्रभाव पड़ा। फिर भी मैंने प्रदेश में बहुत कुछ सुधारा। साफ था कि आज जब पत्रकारों से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ बात कर रहे थे तो उनका यह पूरा प्रयास था कि वह प्रदेश की जनता की सहानुभूति को ज्यादा से ज्यादा हासिल कर सकें! मध्य प्रदेश में सत्ता का संघर्ष वैचारिक प्रतिबद्धता एवं नैतिकता को काफी पीछे छोड़ गया है।

भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को सत्ता से उतार कर कांग्रेस को सत्ता में लाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया बदले हालातों ने आज भाजपा के साथ हैं। स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह में कभी पटी ही नहीं! दोनों अपनी-अपनी काट छांट में हमेशा लगे रहे? मुख्यमंत्री बने कमलनाथ ने हमेशा दिग्विजय से दोस्ती निभाई !यहां यह भी है कि कांग्रेस नेतृत्व ने भी युवा नेता सिंधिया को हमेशा चुप कराने की रणनीति पर ही काम किया! सिंधिया बार-बार अकुलाते रहे लेकिन कांग्रेश नेतृत्व के हाथ उन्हें बस प्यार की झप्पी लेते रहे। आखिरकार सिंधिया बागी हो गए और उन शिवराज के साथ जा पहुंचे जिनको कभी वह सड़क पर खड़े होकर चुनौती देते थे ।भाजपा के शिवराज भी महाराज को गले लगाने से ना चुके। यह वही भाजपा है जो कांग्रेस का राजा एवं वंशवाद की राजनीति को लेकर हमेशा विरोध करती रही।

कांग्रेस नेतृत्व मध्यप्रदेश में सत्ता गंवाने का जिम्मेदार संभवत स्वयं है? कमलनाथ मुख्यमंत्री बनने के साथ ही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी बने रहे। लेकिन सिंधिया को खूब मेहनत करने के बाद भी कमलनाथ सरकार में वह तवज्जो नहीं मिली जो वो चाहते थे! कांग्रेस नेतृत्व भी निष्प्रभावी रहा ।संवादहीनता बढ़ती गई? विश्वासघात के जहर बुझे तीर अथवा खंजर पीठों पर चलते रहे? और फिर मात्र 15 महीनों में मध्य प्रदेश में कांग्रेसी अपनी सत्ता गवा बैठे। सिंधिया के समर्थक विधायक बेंगलुरु की सैर करते रहे !यह भी दिलचस्प है कि कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों से संपर्क साधने का प्रयास किया लेकिन वह सफल ना हो सके! राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी कमलनाथ ने बदली रणनीति से अपने पद से इस्तीफा देना ही उचित समझा। क्योंकि कमलनाथ किसी भी हालत में मध्य प्रदेश की जनता को यह संदेश नहीं देना चाहते थे वह फ्लोर टेस्ट में हार गए हैं?वे त्याग ,सादगी के प्रतिमूर्ति बन जनता की सहानुभूति को लेकर आगे बढ़ना चाहते थे जिसके जरिए उन्हें आगे आनेवाली भाजपा की सरकार से दो-दो हाथ करने हैं।

भाजपा ने मध्य प्रदेश की सत्ता को हासिल करने के लिए काफी दिनों से अपनी राजनीति को तेज कर रखा था। जब धारा 370 को हटाने का समर्थन ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किया था उसी समय भाजपा को एक बड़ा रास्ता मिल गया था! भले ही शिवराज चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए सिंधिया की बुआ यशोधरा राजे सिंधिया का उनसे 36 का आंकड़ा रहा हो लेकिन भाजपा ज्योतिराज सिंधिया के असंतोष एवं उनकी बेचैनी का फायदा उठाने से कतई नहीं चुकी? भगवा परिवार के रणनीतिकारों ने काहिल कांग्रेश का पूरा लाभ उठाया। मध्य प्रदेश में भले ही नाथ का सिंहासन चला गया हो लेकिन अब यहां कमल कमलासन लगाता हुआ नजर आ रहा है। एक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस की सत्ता के जाने के बाद अब एमपी में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की भी उल्टी गिनती प्रारंभ हो गई है? अब कहीं ना कहीं कांग्रेस में इस बात का मंथन चल रहा है कि दिग्विजय सिंह की छाया से मध्य प्रदेश की कांग्रेस को आजाद करके वहां नेताओं की नई पौध को आगे लाया जाए! सबसे ज्यादा कांग्रेस नेतृत्व में इस बात की भी चिंता है कि कहीं मध्यप्रदेश का असर राजस्थान पर भी ना पड़ जाए। इसे लेकर कांग्रेस अब कुंभकरणी नींद से जागती दिख रही है। लेकिन तब तक उसके हाथों से मध्य प्रदेश छिटक कर भाजपा के पाले में जा चुका होगा। साफ है कि मध्य प्रदेश में सत्ता की कुर्सी के लिए भाजपा एवं कांग्रेस के नेताओं ने ऐसा ही सुनियोजित राजनीतिक प्रदर्शन किया जिसकी उम्मीद प्रायः राजनेताओं से सत्ता के लिए की जाती है। आज कांग्रेस में व्याप्त कलह, विश्वासघात एवं पीठ में भोके जाने वाले खंजरों से भाजपा की सरकार का उदय होने जा रहा है। अब मध्यप्रदेश में शिवराज एवं महाराज की जोड़ी जुगलबंदी करेगी। लेकिन यह जोड़ी कब तक काम करेगी, कब तक साथ रहेगी इस पर भी नजर रखने की जरूरत है ?क्योंकि ज्योतिरादित्य की महत्वाकांक्षा कम नहीं हुई है बस उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा को कुछ दिनों के लिए संभाले रखने की कूटनीति को अपनाया है? कुल मिलाकर मध्यप्रदेश में भाजपा का कमलासन लग चुका है जबकि कमलनाथ का सिंहासन जा चुका है?

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