यूपी की इस लोकसभा सीट से लगातार दूसरी बार किसी को नसीब नहीं हुई जीत, BJP ने किया ये काम तो…

बांदा-चित्रकूट संसदीय क्षेत्र में सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस ने अपने-अपने प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतार दिये हैं लेकिन भाजपा ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अगर भाजपा ने फिर अपने पुराने उम्मीदवार पर दांव लगाया तो पराजय का मुंह देखना पड़ सकता है क्योंकि यहां का इतिहास रहा है कि मतदाताओं ने कभी भी लगातार दूसरी बार किसी को संसद जाने का मौका नहीं दिया।

बांदा-चित्रकूट संसदीय सीट पर तीन बार जीत का स्वाद सिर्फ रामसजीवन को मिला लेकिन एक-एक बार छोड़कर। उनकी कुर्मी मतदाताओं पर अच्छी पकड़ रही हैं, इसलिए उन्हें 1989, 1996 में कम्युनिस्ट पार्टी से और 1999 में बसपा से सांसद बनने का मौका मिला। उन्हें भी मतदाताओं ने तीन बार हार का मजा चखाया है। वह छह बार चुनाव लड़े और तीन बार जीत सके लेकिन उन्हें भी लगातार दूसरी बार सांसद बनने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ।

यहां सबसे पहले 1971 में जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़कर रामरतन शर्मा ने हिन्दुत्व की अलख जगाते हुए जीत हासिल की थी। इसके बाद 1991 में एक बार फिर उन्हें टिकट दिया गया, लेकिन वह चौथे स्थान पर पहुंच गये। इसी तरह जनता पार्टी के अम्बिका प्रसाद पाण्डे ने 1977 में जीत दर्ज की फिर 1980 में भाजपा ने दोबारा उन्हें चुनाव मैदान में उतारा लेकिन तीसरे स्थान पर पहुंच गये। इसके बाद भाजपा ने उन्हें 1984 में भी टिकट दिया लेकिन इस बार वह पांचवे स्थान पर खिसक गये। उन्हें मात्र 28,797 मतों पर संतोष करना पड़ा। 1980 में कांग्रेस के रामनाथ दुबे ने जीत हासिल की। 1984 में भीष्म देव दुबे चुनाव जीते। कांग्रेस ने उन्हें 1989 में फिर मौका दिया लेकिन वह तीसरे स्थान पर पहुंच गये। 1989 में रामसजीवन ने सीपीआई के टिकट पर जीत हासिल की। 1991 में भाजपा से प्रकाश नारायण त्रिपाठी को सांसद बनने का मौका मिला। 1996 में बीएसपी से रामसजीवन फिर सांसद बन गये। इस चुनाव में भाजपा ने प्रकाश नारायण त्रिपाठी को दोबारा टिकट दिया वह 11,6607 मत पाकर दूसरे स्थान पर रहे।

1998 में बीजेपी के टिकट पर रमेश चन्द्र द्विवेदी चुनाव जीते। रामसजीवन भी लड़े पर उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 1999 में रामसजीवन फिर लड़े और जीत हासिल की। इस चुनाव में भाजपा ने रमेश चन्द्र द्विवेदी को चुनाव मैदान में दोबारा उतारा लेकिन उन्हे तीसरे पायदान पर खिसकना पड़ा। उन्हें 13,8907 मत मिले थे।

2004 में हुए संसदीय चुनाव में श्यामाचरण ने सपा के टिकट पर जीत हासिल की। उन्होने रामसजीवन (बीएसपी) को हराया। उस समय भैरो प्रसाद मिश्रा को भाजपा ने टिकट दिया था और वह तीसरे स्थान पर रहे। प्रकाश नारायण त्रिपाठी कांग्रेस के टिकट पर लडे़ और मात्र 38,879 मत पर लटक गये। 2009 में सांसद बनने की चाह में भैरो प्रसाद मिश्रा बसपा के टिकट लेकर चुनाव मैदान में कूद पड़े लेकिन चुनाव जीतने में नाकाम रहे। सपा के आरके सिंह पटेल ने जीत हासिल की। 2014 के लोकसभा चुनाव में पुनः भाजपा में लौट आयें भैरो प्रसाद मिश्रा ने मोदी लहर में अन्ततः जीत हासिल की और पूर्व सांसद रहे आरके सिंह पटेल दोबारा चुनाव लड़े उन्हें भी पूर्व उम्मीदवारों की तरह हार का मुंह देखना पड़ा।

इस तरह देखा जाये तो रमेश चन्द्र द्विवेदी ने दो बार, अम्बिका प्रसाद ने तीन बार प्रकाश नारायण त्रिपाठी ने चार बार और आरके सिंह पटेल ने तीन बार बाँदा संसदीय क्षेत्र से किस्मत आजमाई लेकिन एक-एक बार जीत मिली। वही श्यामाचरण गुप्ता भी जीत हासिल करने से पहले दो बार चुनाव हार चुके हैं। मात्र रामसजीवन भाग्यशाली हैं जिन्हें जीतने का मौका मिला पर जीत का स्वाद हारने के बाद मिला हैं।

यहां से अब तक हुए सांसद

  • 1971–रामरतन शर्मा–भारतीय जनसंघ
  • 1977–अम्बिका प्रसाद पाण्डेय–जनता पार्टी
  • 1980–रामनाथ दुबे–कांग्रेस
  • 1984–भीष्म देव दुबे–कांग्रेस
  • 1989–राम सजीवन–सीपीआई
  • 1991–प्रकाश नारायण त्रिपाठी–भारतीय जनता पार्टी
  • 1996–राम सजीवन–बहुजन समाज पार्टी
  • 1998–रमेशचंद्र द्विवेदी–भारतीय जनता पार्टी
  • 1999–राम सजीवन–बहुजन समाज पार्टी
  • 2004–श्यामचंद्र गुप्ता–समाजवादी पार्टी
  • 2009–आरके सिंह पटेल–समाजवादी पार्टी
  • 2014–भैरों प्रसाद मिश्रा–भारतीय जनता पार्टी
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